रावण ऋषि पुत्र था। वह पुलस्त्य का पोता था और विश्रवा का पुत्र। उसकी मां राक्षसराज सुमाली की बेटी थी। राक्षस गुह्य विद्याओं के जानकार थे। वे जानते थे कि ऋषि वीर्य को किस विशिष्ट काल में धारण कराने पर राक्षसों के हितों का साधक जन्म लेगा। उसी समय कैकसी ने विश्रवा से प्रणय-याचना की थी। रावण और कुंभकर्ण का जन्म राक्षसों की हित-रक्षा के लिए राक्षस प्रमुखों द्वारा करवाया गया था; ऐसा कहना गलत न होगा।
तप और अहं का सम्मिश्रण था राक्षसों में। रावण भी इससे अछूता कैसे रह सकता था। अपने जीवन में उसने सिर्फ विजय को ही याद रखा, हार को तो उसने दुःस्वप्न की तरह भूलने की ही कोशिश की।
शास्त्रों का परम ज्ञाता था रावण, फिर क्या विष्णु के रामरूप में अवतार लेने की बात उससे छिपी थी? विद्वानों का ऐसा मत है कि इस बात को जानते हुए ही रावण ने राम से विरोध किया। तामसी शरीर की विवशता थी, इसीलिए अपमानित करके उसने विभीषण को राम के पास भेज दिया।
अपनी गलतियों को जानते हुए भी उन्हें अस्वीकारना रावण की विवशता थी-देवताओं से समझौता उस जाति के हित और सम्मान की रक्षा नहीं करता था; जिसमें उसका जन्म हुआ था, जिसके विजय अभियान का नेतृत्व उसके हाथों में था। योद्धा को भी तो योगी की गति प्राप्त
होती है। प्रकाश भेद डालता है, घने अंधकार को। यह सिद्धांत अनुभव सिद्ध है, लेकिन इतिहास की इस सच्चाई को भी नकारा नहीं जा सकता कि बुराई ने सदा ही अच्छाई को ढका है। 'पाप से घृणा करो, पापी से नहीं, ऐसा कहने के बाद भी क्या हम ऐसा कर पाते हैं? शायद नहीं! तभी तो रावण की तमोगुणी राक्षसी वृत्तियों की कालिमा ने उसके उजले पक्ष को ढक दिया। इस ग्रंथ
में शस्त्र-शास्त्र ज्ञाता महाबली रावण के उसी उजले पक्ष को उजागर किया गया है। यह ग्रंथ पांच खंडों में विभाजित है। प्रथम खंड में है रावण का संपूर्ण जीवन वृत्त। इसे मूल संस्कृत के साथ सरल हिंदी में दिया गया है। मूल को जहां से उद्धृत किया गया है, उसके अनुसार यह अंश वाल्मीकीय रामायण का अंश है । मूल का परित्याग हमने इसलिए नहीं किया, ताकि संस्कृत भाषा का साहित्यिक आनंद भी पाठक ले सकें । दूसरे खंड में उन साधनाओं की चर्चा है, जो शिवोपासना से संबंधित हैं। प्रणव व पंचाक्षर साधना के साथ ही इसमें लिंग स्थापना और शिवपूजन की शास्त्रीय विधियां दी गई हैं। तीसरे खंड में तंत्र-मंत्र साधनाओं के रहस्यों को उजागर किया गया है। तंत्र का एक भाग है वनस्पतियों के चमत्कारी प्रयोग। तंत्र का यह भाग
आयुर्वेद से संबंधित होता हुआ भी उससे बिलकुल भिन्न है । रावण तंत्र का ज्ञाता था । वह जानता था कि यदि बच्चे स्वस्थ एवं नीरोग नहीं होंगे, तो कोई भी समाज सशक्त नहीं होगा इसीलिए उसने जहां स्वस्थ, रोगमुक्त तथा दीर्घायु बनाने वाले अंकों की चर्चा की, वहीं नवजात शिशुओं व उनकी माताओं के स्वास्थ्य के भी नुस्खे दिए।
योद्धा के लिए औषधि ज्ञान जरूरी है, रावण उसका भी परम ज्ञाता था। इस ग्रंथ के चतुर्थ खंड से उसके इसी औषधि संबंधी ज्ञान का संकेत मिलता है। पंचम खंड में ज्योतिष के विशेष योगों की चर्चा है इस खंड में ऐसी सामग्री का समावेश नहीं किया गया है, जो 'भृगु संहिता' जैसे ग्रंथों में प्राप्त हैं। विदित हो कि बाजार में उपलब्ध 'लाल किताब' का संबंध भी रावण से ही है। इस पुस्तक में ज्योतिष, हस्तरेखा और सामुद्रिक शास्त्र का समावेश है। यदि आपकी रुचि ज्योतिष में है, तो यह पुस्तक आपके लिए उपयोगी है-इसमें नयापन है।
पुस्तक का नाम/ Name of Book : असली प्राचीन रावण संहिता | Sampurn Ravan Samhita PDF Download
पुस्तक के लेखक/ Author of Book : पंडित किशन लाल शर्मा | Kisan lal Sharma
श्रेणी / Categories : हिंदू - Hinduism
पुस्तक की भाषा / Language of Book : हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज़ / Size of Book : 10.8 MB
कुल पृष्ठ /Total Pages : 734
॥ सूचना ॥
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