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Friday, April 23, 2021

वैष्णव की फिसलन :  हरिशंकर परसाई | Vaishnav Ki Fisalan by Harishankar Parsai Hindi PDF Download

वैष्णव की फिसलन :  हरिशंकर परसाई | Vaishnav Ki Fisalan by Harishankar Parsai Hindi PDF Download

 

Vaishnav Ki Fisalan  Book in PDF Download

By clicking on the link given below, you can download the written book Vaishnav Ki Fisalan  in PDF by  Harishankar Parsai.

 

वैष्णव की फिसलन  हिंदी किताब करें पीडीएफ में डाउनलोड

नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके, आप  लिखित पुस्तक  वैष्णव की फिसलन  हिंदी को  हरिशंकर परसाई  द्वारा पीडीएफ में डाउनलोड कर सकते हैं।


Particulars

(विवरण)


 eBook Details (Size, Writer, Lang. Pages

(आकार, लेखक, भाषा,पृष्ठ की जानकारी)

 पुस्तक का नाम (Name of Book) 

वैष्णव की फिसलन | Vaishnav Ki Fisalan

 पुस्तक का लेखक (Name of Author) 

हरिशंकर परसाई|Harishankar Parsai 

 पुस्तक की भाषा (Language of Book)

 हिंदी (Hindi) 

 पुस्तक का आकार (Size of Book)

  2.4 MB

 कुल पृष्ठ (Total pages )

 108

 पुस्तक की श्रेणी (Category of Book)



 

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Wednesday, February 17, 2021

जैसे उनके दिन फिरे - हरिशंकर परसाई | Jaise Unke Din Phire - Harishankar Parsai | Hindi PDF Download

जैसे उनके दिन फिरे - हरिशंकर परसाई | Jaise Unke Din Phire - Harishankar Parsai | Hindi PDF Download

 जैसे उनके दिन फिरे - हरिशंकर परसाई | Jaise Unke Din Phire - Harishankar Parsai | Hindi PDF Download


एक था राजा। राजा के चार लड़के। रानियां तो अनेक थीं, महल में एक 'पिंजरापोल' ही खुला था। पर बड़ी रानी ने बाकी रानियों के पुत्रों को जहर देकर मार डाला था और इस बात से राजा साहब बहुत प्रसन्न हुए। वे नीतिवान थे और जानते थे कि चाणक्य का आदेश है, 'राजा अपने पुत्रों को भेड़िया समझे।' बड़ी रानी के चारों लड़के जल्दी ही राजगद्दी पर बैठना चाहते थे, इसलिए राजा साहब को बूढा होना पड़ा।


पुस्तक का नाम/ Name of Book :   जैसे उनके दिन फिरे - व्यंग | Jaise Unke Din Phire
पुस्तक के लेखक/ Author of Book :  हरिशंकर परसाई - Harishankar Parsai
श्रेणी / Categories :  व्यंग्य / Vyangya
पुस्तक की भाषा / Language of Book : हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज़ / Size of Book : 2.9 MB
कुल पृष्ठ /Total Pages : 17



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कहत कबीर - हरिशंकर परसाई | Kahat Kabeer - Harishankar Parsai | Hindi PDF Download

कहत कबीर - हरिशंकर परसाई | Kahat Kabeer - Harishankar Parsai | Hindi PDF Download

कहत कबीर - हरिशंकर परसाई | Kahat Kabeer - Harishankar Parsai | Hindi PDF Download


सुखिया सब संसार है खावै और सोवै 

दुखिया दास कबीर है जागे और रोवै

इस पुस्तक में मेरे कुछ 'सुनो भई साधो स्तभ सेव..... ५ . स्तभ में सन् १९५८ से दैनिक 'नयी दुनिया', अब 'नवीन दुनिया' जबलपुर, में लिख रहा हू। १६४७ से ही मैं नियमित स्तभ-लेखन कर रहा हू। १६४७ से 'प्रहरी' साप्ताहिक, जबलपुर मे 'अघोर भैरव' के उपनाम से कभी-कभी स्तभ लिखा। फिर 'कल्पना' मे 'और अत में', 'सारिका' मे 'कविरा वडा बाजार में', 'तीसरी आजादी का जाच कमीशन' और तुलसिदास चदन पिसे' तिखे । १६५६-५७ मे 'परिवतन' जबलपुर में 'अरस्तू की चिट्टी' स्तभ लिया। 'करेंट' मे 'माटी कहे कुम्हार से' तथा 'जनयुग' मे 'ये माजरा क्या है' स्तभ लिसे । अभी भी 'सुनो भई साधो' चल रहा है। देशवधु' मे
'पूछिए परसाई से सप्ताहिक स्तभ में पाठको के प्रश्नों के उत्तर देता हू । विपुल सामग्री इन स्तभो की मेरे पास है, जिसमे से बहुत थोडी पुस्तक- रूप में आयी है। इस पुस्तक में सुनो भई साधो' स्तभ के कुछ लेख हैं।
इहैं पाठका ने शुरू से बहुत पसद किया। साहित्य शास्त्रियों ने पहले घीजर इनकी हत्या की पर मैं लिखता गया
न सताइश की तमन्ना न सिला की परवा न सही गर मरे अशआर मे मानी न सही।
तात्कालिक घटना के संदर्भ में लिखे इन स्तमा व्यापक और गर्भीर परियोजना वो पिछले कुछ समय से शास्त्री समझ रहे हैं औौर सौंदयशास्त्र में तरमीम करने की जरूरत भी महसूस की जा रही है। बहरहाल, यह जो हो, पाठरा के हाथ में है।
पुस्तक की सामग्री का चयन और सपादन डॉ० श्यामसुंदर मिश्र ने किया है।


पुस्तक का नाम/ Name of Book :   क़हत कबीर | Kahat Kabeer
पुस्तक के लेखक/ Author of Book :  हरिशंकर परसाई - Harishankar Parsai
श्रेणी / Categories :  साहित्य / Literature,
पुस्तक की भाषा / Language of Book : हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज़ / Size of Book : 3 MB
कुल पृष्ठ /Total Pages : 210



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Saturday, February 13, 2021

बेईमानी की परत | Beimani Ki Parat

बेईमानी की परत : हरिशंकर परसाई द्वारा हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक | Beimani Ki Parat : by Harishankar Parsai Hindi PDF Book 

बेईमानी की परत | Beimani Ki Parat

Description- विवरण :-

पिछले सालों में लिखे गये निबंधों में से २२ इस पुस्तक में जा रहे हैं । कहानी के साथ ही मैं शुरू से निबंध भी लिखता रहा हूँ और यह विधा अपनी प्रकृतिगत स्वच्छंद्ता तथा ्यापकता के कारण मुझे बहुत अनुकूल भी प्रतीत हुई है । इसकी सभावनामो का कितना उपयोग कर पाया हूँ, यह दूसरी बात है । इतना जरूर जानता हूँ कि निबंध लिखते हुए मुझे सार्थकता मोर संतोष का अनुभव हुमा है।
मुख्य रूप से मैंने कहानियां लिखी हैं; गो इसमें भी मतभेद है कि वे नये शास्त्रीय मान से कहा नियाँ है भी या नहीं। बहुत बारीक समझ के कुछ लोगों ने कहा भी है कि वे'ची मन पर असर तो डालती है, पाद भी रहती है, गूंजती भी हैं-मगर उनके कहानी होने में दाक होता है । होता होगा। अपने पैर में जो जूता फिट न बैठे उसे कोई जूता ही नही मानते । वे भून जाते हैं कि कुछ जूते सिर के नाप के भी बनाये जाते हैं ।
मगर यह नियंघ-सग्रह है । इसे पाठको के हाथो में देते युझे न सकोर है. न झिझक। मैं पूरे विश्वास से दे रहा हूँ क्योकि इतने वर्षों में मैंने पाटक पर भरोसा किया है भोर उसने मुझ पर । एक लास तरह का पाठक 'पालो वक कहलाता है। उसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता।


पुस्तक का नाम/ Name of Book :   बेईमानी की परत | Beimani Ki Parat
पुस्तक के लेखक/ Author of Book :  हरिशंकर परसाई - Harishankar Parsai
श्रेणी / Categories :  साहित्य / Literature
पुस्तक की भाषा / Language of Book : हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज़ / Size of Book : 3 MB
कुल पृष्ठ /Total Pages : 132



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हम इक उम्र से वाकिफ हैं | Hum Ek Umr Se Wakif Hai PDF Download

हम इक उम्र से वाकिफ हैं | Hum Ek Umr Se Wakif Hai PDF Download

हम इक उम्र से वाकिफ हैं | Hum Ek Umr Se Wakif Hai
हम इक उम्र से वाकिफ हैं

 हम इक उम्र से वाकिफ हैं

परसाई जैसा बड़ा रचनाकार जब ‘हम इक उस से वाकिफ हैं’ होने की बात करता है तो उसका मतलब सिर्फ उतना ही नहीं होता, क्योंकि उसकी ‘उम्र’ एक युग का पर्याय बन चुकी होती है। इसलिए यह कृति परसाई जी के जीवनालेख के साथ-साथ एक लम्बे रचनात्मक दौर का भी अंकन है। परसाई जी ने इस पुस्तक में अपने जीवन की उन विभिन्न स्थितियों और घटनाओं का वर्णन किया है, जिनमें न केवल उनके रचनाकार व्यक्तित्व का निर्माण हुआ, बल्कि उनकी लेखनी को भी एक नई धार मिल सकी। उनका समूचा जीवन एक सक्रिय बुद्धिजीवी का जीवन रहा। वे सदा सिद्धान्त को कर्म से जोडक़र चले और अपनी रचनात्मकता पर काल्पनिक यथार्थवाद की छाया तक नहीं पडऩे दी। इसलिए आकस्मिक नहीं कि इस पुस्तक में हम उन्हें विभिन्न आन्दोलनरत संगठनों के कुशल संगठनकर्ता के रूप में भी देख पाते हैं

संस्मरण लिखने का प्रस्ताव आया, तो अचानक फैज अहमद फैज का यह शेरद  याद आ गया

हम इक उम्र मे वाकिफ हैं अब न समझाओ के. लुत्फ क्या है मेरे मेहरवा सितम क्या है।

मैंने शेर का आरभ का हिस्सा शीर्षक बना दिया हम इक उम्र से वाकिफ हैं। न जाने क्यो उपचेतन से अचानक बालकृष्ण शर्मा 'नवीन की ये पक्तियाँ भी वौध उठी हम विषपायी जनम के सहे अबोल कुबोल नेक न मानत अनख हम जानत अपनो मोल

कही उपचेतन मे जीवन-सघर्ष के अनुभव, कड़वाहट, अपमान और उत्पीडन, अन्याय, यातना की स्मृतियाँ होगी। साथ ही विष यो पचाकर जीने और लडने की स्मृति । और इसके साथ ही आत्मगौरव कि हमने टुच्ची बातों का युरा नही माना। हम अपनी कीमत जानते हैं। वह वीमत हम वसूलते हैं और तुम, कभी हँसने और तकलीफ देनेवाले, अब अपने निर्लज्ज व्यक्तित्व के माथ बह कीमत देते हो, क्योंकि वह कीमत देकर अब तुम छोटे में थोड़ा बडे होते हो। ये अनुभव मुझे बहुत हुए हैं कि जो कभी मेरी निंदा और उपहास करके बड़े बनते थे, वहीं अब यह कहकर बड़े बनते हैं कि दर्शन करके आ रहे हैं यझे इनकी दरिद्रता पर दया आती है और पट्टे पर हैंसी। गुस्सा नही आता।


पुस्तक का नाम/ Name of Book :   हम इक उम्र से वाकिफ़ हैं | Hum Ik Umar Se Wakif Hai
पुस्तक के लेखक/ Author of Book :  हरिशंकर परसाई - Harishankar Parsai
श्रेणी / Categories :  जीवनी / Biography
पुस्तक की भाषा / Language of Book : हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज़ / Size of Book : 3 MB
कुल पृष्ठ /Total Pages : 151



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